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झंझट झमेला भरे घरे क दावत स चैन अउ सान्ति क सूखी रोटी क टूका खाउब उत्तिम अहइ।
बुद्धिमान दास एक अइसे पूत पइ सासन करी जउन घरे बरे सर्मनाक होत ह। बुद्धिमान दास उ पूत क जइसा ही बसीयत पावइ मँ सहभागी होइ।
जइसे चाँदी अउ सोना क आगी मँ डाइ क सुद्ध कीन्ह जात ह वइसे ही यहोवा लोगन क हिरदय क परखत सोधत ह
दुट्ठ जन, दुट्ठ क वाणी क सुनत ह, लबार बैर भरी वाणी पइ धियान देत ह।
अइसा मनई जउन गरीब क हँसी उड़ावत ह, उ ओकरे सिरजनहार क अपमान करत ह। अउर उ जउन कउनो दूसर क समस्या पइ खुस होत ह सजा झेलब्या।
नाती-पोतन बृद्ध जन क मवुट होत हीं, अउर महतारी-बाप ओनके लरिकन क मान अहइँ।
मूरख बरे जियादा बोलब उत्तिम नाहीं अहइ वइसे ही सासक क झूठ बोलब केतना बुरा होइ!
घूस देइवाले क घूस महामंत्र जइसे लागत ह, जेहसे उ जहाँ भी जाइ, सफल ही होइ जाइ।
जदि कउनो मनइ कउनो क जउन ओकर बुरा किहस ह छमा कइ देत ह तउ उ पचे दोस्त होइ सकत ह। किन्तु उ मनइ जउन छमा करत ह उ लगातार दूसर क गलती क याद करत ह तउ ओनकर दोस्ती टूट जात ह।
विवेकी क धमकाउब ओतना प्रभावित करत ह; जेतना मूरखन क सौ-सौ कोड़न भी नाहीं करतेन।
दुट्ठ जन तउ बस हमेसा विद्रोह करत रहत ही; ओकरे बरे दाया स हीन अधिकारी पठवा जाइ।
आपन बेववूफी मँ चूर कउनो मूरख स मिलइ स अच्छा बाटइ, कि उ रीछिन स मिलब जेहसे ओकर बच्चन क छीन लीन्ह गवा होइ।
भलाई क बदले मँ अगर कउनो बुराई करइ तउ ओकरे घरे क बुराई नाहीं तजी।
झगड़ा सुरू करब अइसा अहइ जइसे बाँध क टूटब अहइ, तउ, एकरे पहिले कि तकरार सुरू होइ जाइ बात खतम करा।
यहोवा एन दुइनउँ ही बातन स घिना करत ह, दोखी क छोड़ब, अउर निदोर्ख क सजा देब।
मूरख क हाथन मँ धने क का प्रयोजन। काहेकि, ओका चाह नाहीं कि बुद्धि क मोल लेइ।
मीत तउ सदा-सर्वदा पिरेम करत ह। एक सच्चा भाइ बुरे दिनन मँ साहयता करत ह।
विवेकहीन जन ही किरिया स हाथ बँधाइ लेत अउर आपन पड़ोसी क ऋृण ओढ़ लेत ह।
जेका लड़ाई - झगड़ा भावत ह, उ तउ सिरिफ पापे स पिरेम करत ह अउर जउन डींग हाँकत रहत ह उ तउ आपन ही नास बोलावत ह।
वुटिल हिरदय जन कबहुँ फूलत फलत नाहीं अउर जेकर वाणी छली भइ अहइ, विपद मँ गिरत ह।
मूरख पूत बाप बरे पीरा लिआवत ह, मूरख क बाप क कबहुँ आनंद नाहीं होत।
खुस रहब सब स बड़की दवा अहइ, मुला बुझा मन हाड़न क झुराइ देत ह।
दुट्ठ मनई, निआव क गलत उपयोग करइ बरे एकंात मँ घूस लेत ह।
बुद्धिमान जन बुद्धि क समन्वा धरत ह, मुला मूरख क आँखिन धरती क छोरन तलक भटकत हीं।
मूरख पूत बाप क तेज ब्यथा देत ह, अउर महतारी बरे जउन ओका जनम दिहस, कड़ुवाहट भरि देत ह।
कउनो निदोर्ख क दण्ड देब उचित नाहीं, ईमानदार नेता क पीटब नीक नाहीं अहइ।
गियानी जन खामूस रहत ही, समुझ-बूझ वाला जन आपन पइ काबू राखत ह।
मूरख भी जब तलक नाहीं बोलत नीक लागत ह। अउर अगर आपन वाणी रोकइ तउ गियानी जाना जात ह।